लहसुन
लहसुन की सभी किस्मे औषधीय गुणों
वाली नहीं होतीं। सबसे छोटे आकार का लहसुन जो बिना उर्वरक के उगाया जाता है, औषधियों के लिए सबसे उपर्युक्त है। आयुर्वेदिक दृष्टि से ताजा लहसुन को दवाओं में शामिल किया जाना चाहिए। लहसुन में मौजूद ईथरयुक्त तेल को संरक्षित नहीं किया जा सकता। संरक्षण से उसका त्रिदोष संघटन बदल जाता है। इसमें अम्ल को छोड़कर "शेष पाँच रस मौजूद रहते हैं। इस अत्यंत गुणयुक्त औषधि का यही रहस्य है। लहसुन की चटनी त्वचा पर लगाने से दर्द से • छुटकारा मिलता है। नियमित लहसुन लेने से कीड़े नहीं काटते .अतः यह मलेरिया आदि रोगों से बचाता है जो मच्छरों के काटने से फैलते हैं। यह दृष्टिवर्धक है तथा स्नायु, मस्तिष्क, रक्त, कोशिकाओं और हृदय को शक्ति प्रदान करता है। यह ओज में वृद्धि करके शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। संधि के दर्द के लिए यह अच्छी औषधि है, क्योंकि यह वात को दूषित नहीं होने देता। जिगर को गति देता है तथा पाचन क्रिया को ठीक करता है। यह प्रति मूत्रल है। कम मात्रा में लहसुन का प्रतिदिन प्रयोग किया जाना चाहिए। लहसुन की एक या दो तुरियां प्रतिदिन लें। यदि आप पित प्रधान व्यक्ति है तो लहसुन को पीसकर उसमें मिश्री मिलाकर ठंडे पानी के साथ लें। यदि आप वात प्रधान व्यक्ति हैं तो इसे घी के साथ लीजिए। यदि कफ प्रधान है तो शहद के साथ लीजिए। पित दूषित हो तो लहसुन न ले। गर्भवती महिलाएं लहसुन न लें। अधिक लहसुन से यदि कष्ट हो रहा हो तो धनिये का काढ़ा लिया जाना चाहिए। प्रतिदिन खुराक 1 से 4 ग्राम। लहसुन की गंध दूर करने तथा उसके पितीय प्रभाव को कम करने के लिए सौफ व इलायची चबानी चाहिए। त्रिदोषीय स्थिति विकृत वात व कफ को ठीक करता है। रस मधुर, लवण, कटु, तिक्त, कषाय। वीर्य गर्म
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