हल्दी
इस पौधे की जड़ का प्रयोग किया जाता है। इसकी आकृति अदरक के समान होती है। इसका रंग चमकीला पीला होता है तथा इसे आसानी से पहचाना जा सकता है। बाजार में पीसी हुई हल्दी मिलती है जो कई बार शुद्ध नहीं होती। यह सुझाव दिया जाता है कि आप सूखी हल्दी खरीदकर स्वयं पिसवाएं। हल्दी को एक वर्ष के बाद औषधि के रूप में प्रयुक्त नहीं किया जाना चाहिए। धीरे-धीरे यह अपने औषधीय गुण खो देती है। हल्दी रक्तशोधक है तथा एलर्जी दूर करती है। त्वचा रोगों को दूर करने में यह सहायक है। हल्दी चिकित्सा का वर्णन पहले किया जा चुका है। जीवाणुनाशक है, सूजन दूर करती है तथा घाव ठीक करती है। यह छाती से संबंधित दर्द आदि साधारण शिकायतों को दूर करती है। हल्दी वाला दूध (पिछले अध्याय में विधि दी गई है) थकान दूर करता है तथा शरीर को शक्ति प्रदान करता है। दुर्घटना आदि के कारण चोट लगने पर हल्दी वाला दूध लेना बहुत लाभकारी होता है। मेरा सुझाव है कि सभी लोग सर्दी के दिनों में हल्दी वाला दूध अवश्य लें। अगर चोट के कारण आ गई हो तो हल्दी को सरसों के तेल में पकाकर उसे पुरानी
•रुई पर लगाकर सूजन पर बांध लें। त्रिदोषीय स्थितिः तीनों दोषों को शांत करती है। रस: कटु, कषाय । वीर्य : गर्म
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