दालचीनी
इसकी छाल का इस्तेमाल होता है। पश्चिमी देशों की रसोई में भी इसका चलन है। वहां प्राय: पाउडर रूप में मिलती है अतः लोग इसकी आकृति से परिचित नहीं हैं। इसके स्वाद व गंध से परिचित हैं। इसका ते दर्दनाशक है तथा बड़ी इलायची के साथ इसका काढ़ा थंकान ज्वर तथा दर्द दूर करता है। थकान व सर्दी के कारण सिरद की स्थिति में यह काढ़ा विशेष लाभकारी है। दालचीनी ओज म वृद्धि करती है तथा रक्त को शुद्ध करती है। इसमें फफूंद वायरस तथा बैक्टीरिया रोधी गुण हैं। प्रतिदिन की मात्रा : एक से तीन ग्राम। तेल 2 से 5 बूंदें।
त्रिदोषीय स्थिति : पित्तवर्द्धक तथा कफ व वातशामक । रस : मधुर, तिक्त, कटु । वीर्य : गर्म ।
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