जायफल
जायफल सुपारी जैसा दिखाई देता है और इसके फूल को जावित्री कहते हैं। इन दोनों का उपयोग प्रायः मसालों में किया जाता है। विकृत वात और कफ के • लिए यह बहुत उपयोगी है। जायफल को पानी के साथ पत्थर पर घिसकर दर्द निवारण के लिए लेप किया जाता है। इसके महीन चूर्ण को गर्म सरसों के तेल में डालकर फोड़े-फुंसियों पर लगाया जाता है। शिशन की पेशियों की दुर्बलता में इसका उपयोग तथा शिशन पर लेप करने से बहुत लाभ होता है। कैवल्य के उपचार के लिए उत्तम है। जायफल का वीर्य गर्म होने के कारण इसका उपयोग घी के साथ करें। गर्म घी में इसे डालकर दाल या सूप में मिलाकर भी खाया जा सकता है। यह निद्राजनन है इसलिए इसका प्रयोग रात को करने का सुझाव दिया जाता है। यह हृदय को बल प्रदान करता है तथा मतली, पेचिश इत्यादि में उपयोगी है। मन को शांत करता है। प्रतिदिन की मात्रा आधा ग्राम (एक
चौथाई फल) या 1-3 बूंदें इसके तेल की । त्रिदोषीय स्थिति विकृत वात, कफ को ठीक कर पित्त को बढ़ाता है। रस: कटु, तिक्त । वीर्य : गर्म ।
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